बूढ़ी देवी अम्मा
की कहानी
जब हम छोटे थे तब नदी,पेड़,पहाड़ और राजा महराजा और परीयों की कहानी सुनते थे।
वैसे ही मोहल्ले में एक बुढ़ी दादी रहती थी जो बहुत ही सुंदर और संस्कार वाली थी।
बच्चों को रोज शाम कहानियाॅं सुनाया करती थी। और हम भी बड़े मजे के साथ सुनते थे और ये बाते अब तक नहीं भूले---
बहुत साल पहले हमारे गांव में एक सुशीला नाम की महिला रहती थी। जिसकी दिमांगी हालत ठीक न होने की वजह से वह फटी पुरानी कपड़े पहन, मजदूरीे किया करती थी। उसकी एक लड़की भी है देवी नाम की। वह रोज स्कूल जाती और घर को भी सम्हालती है।
वैसे तो महिला एक आमीर घराने से थी। लड़की के पिता जमींदार थे। वह जात-पात में भेदभाव रखने की वजह से रिष्ता स्वीकार नहीं किए और मन पसंद ब्याह करने की वजह से उन्हें घर से बेदखल कर था।
उनके पति सादी के पांच साल बाद एक गंभीर बीमारी के शिकार हो गए, और उसका देहांत हो गया।
घर पर उसे रोज ताने मारने की वजह से दिमांग पर बुरा असर पड़ने से उनकी हालात बत से बत्तर होने लगी थी।
सुशीला का कोई सहारा नही वह अब मजदूरी कर जीवन गुजारने और बच्ची को अच्छी शिक्षा देकर बड़ा किया। उनकी घर की हालात अब पहले से अच्छी होने लगी थी।
जैसे तैसे जीवन गुजर ही रही थी कि सुषीला को कुछ गंभीर बीमारी ने घेर लिया। उनकी घर की स्थिति अब और भी बिगड़ने लगी थी।
मां अब सोचने लगी..... मेरे बच्ची का ध्यान अब कौन रखेगी। कैसे रहेगी, ये सोचते मां की आॅखों में आंसु आ गए। मां ने देवी को पास बुलाकर, सिर पर हाथ फेरते हुए कहाॅं-
मेरे बच्ची अब तुम बड़ी हो गई हो और समझदार भी, मेरा जीवन कब तक है, ये मैं नहीं जानता, अब घर का ध्यान तुम्हें रखना होगा। ये सब सुन देवी ने मां को गले से लगा लिया।
देवी कभी कभी मां के साथ मजदूरी करने चली जाती थी। जिससे की घर का राशन, मां की दवाई, पढ़ाई कर अपना दायित्व निभा रही थी।
स्कूल जाते रास्ते पर एक कागज का टुकड़ा मिलता है। उसमें बीमारी के बारे में स्पश्ट जानकरी दिए थे। यह सोचते हुए स्कूल टीचर से इसके बारे में चर्चा करती है। स्कूल टीचर ने इसके बारे में पूरी जानकरी बताई, कहां कि इसमें बहुत सारे पैसे लगेंगे। कैसे जुटा पाएंगी।
देवी ने टीचर से कहांः खुब मेहनत करूंगी, चाहे बूढ़ी क्यों न हो जाउं पर पैसा जरूर इकठ्ठा करूंगी। मां की इलाज के लिए।
यह सुन टीचर ने देवी को साबासी दी। और कहां कि बस हिम्मत मत हारना और अब से मजदूरी नहीं करोगी।
अगले ही दिन टीचर ने देवी को घर पर बुलाई और कपडे सिलाई के बारे में जानकारी दी।
देवी ने खुब मेहनत करके सिलाई सिखी और मेडम के यहां पैसे कमाने लगी। जिससे घर का राशन और मां की दवाई भी आ जाएं।
टीचर ने देवी से कहांः अब यहां तुम काम नहीं करोगी, यह सब सुन देवी की आखों में आंसु आ गए। और कहां क्यों टीचर मैम।
टीचर ने कहां, मतलब ये सिलाई मशीन तुम अपने घर ले जाना और वहीं से ये सब काम करोंगी। ये सुन देवी ने टीचर के पैर छुकर आर्शीवाद लिए और कहां इसका ऐहशान कैसे चुकाउंगी टीचर मैम।
टीचर ने नम्रता पूर्वक कहां ये कोई ऐहशान नहीं देवी,
मेरी बच्ची, ये मेरी गुरूदक्षिणा है। जिस लगन से तुमने मेहनत और अपनी दायित्व की पूर्ती हेतु कार्य में तत्पर रहीं। मुझे गर्व है तुम पर। ऐसे होनहार छात्रा कीं टीचर जो हूं मैं।
देवी ने पढ़ाई में अव्वल स्थान और साथ ही साथ सिलाई में खुब मेहनत और पैसे इकठ्ठा करके, मां का ईलाज भी किया। देवी ने मां को टीचर से मिलाया और उसका आभार व्यक्त किया।
दादी जी नेे कहानी में विराम लगाते हुए कहां
जीवन में कुछ सीख- हार कभी मत मानों, बस दृढ़ संकल्प शक्ति के साथ खुब मेहनत करों, ये मत सोचो की दुनियां क्या कहेंगी। बस अपना लक्ष्य साधने में लग जाओं
जैसेः देवी ने अपने मां के लिए जीवन में खुब मेहनत कि और एक ऐसे गुरू के रूप में कोई ऐसा साथी जो जिसका नाम मेहनत और लगन है।
दादी जी के मुख से यह सब सुन, हम भी अपने जीवन के प्रति सजग रहेंगे, यह कहके अपने घर के लिए प्रस्थान हुए।
अब तक बच्चों को पता भी नहीं चल पाया कि दादी आखिर वहीं देवी अम्मा है जो जो अपनी मां के लिए जीवन में खुब मेहनत की है। और अब तक शादी भी नहीं हुई।
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