एंटीना
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फिर
से वहीं आंखो की धुंध जो हल्का
झुंझालाहट और यादे जो स्केच
की तरह दिखाई पड़ता है। कुछ
अरशा बित गया है, उन
लम्हों को याद करने में।
मुझे
थोड़ी सी याद है जब मैं आठ नौ
साल का था। हमारे यहां वैसे
तो कुछ ना था, मगर
ख्वाहिश जो देखने का कम न हुआ।
हमारे घर के पास मौसी और एक
बाबा रहता था जिनके यहां टीवी
हुआ करता और मोहल्ले के सभी
बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्गों
तक टीवी देखने के लिए उनके
यहां जाए करते थे। बढ़ा मजा था
उस जमाने में टीवी देखने का
अपना एक अलग ही मजा हुआ करता
था हमारा।
और
सबसे अच्छी बात तो टीवी का
एंटीना जो बेहद पसंद आता था।
एक
दिन मैं बहुत खुश हुआ जब मुझे
पता चला कि हमारे यहां भी टीवी
लेकर पापा आएंगे। उस वक्त खुशि
का ठिकाना ना रहा। लेकिन जैसे
तैसे वक्त तो गुजर गया।
शाम
को पापा टीवी लेकर घर में लाएं
तब मैंने देखा एक अजीब सा यंत्र
जैसा दिखाई पड़ने में जो तितलियों
की पंखुड़ी जैसा दिखई दे रहा
था। बहुत कुछ सिखाती थी वह
यंत्र बड़ा मजेदार था,
मजेदार इसलिए
था क्योंकि जब हमारे यहां टीवी
में वायर और एंटीना तो लग गया
पर चालू नहीं हुआ। अब तो मेरा
मायूस चेहरा इधर उधर टिपीर
टापर घुस्से से लाल हुआ जा रहा
था। और करता भी तो क्या नदान
जो था मेरे अंदर। अब तो पता चल
ही गया, खराब
टीवी में नही बल्कि एंटीना
में था तभी टीवी चालू नही हो
रहा था। मैंने धीरे से एंटीना
को थोड़ा घुमाया फिर टीवी पूरी
तरह चल चित्र से भर उठा। फिर
मेरा लाल चेहरा खुशि से मचल
उठा।
खुशि
मिलता था ऐसे चीजों में जो हम
पर हावी तो न हुआ पर कुछ सिखा
गया वह यंत्र हमें।
बनते
बिगढ़ते रिश्तों में चाहे कितनी
भी दरार पढ़ जाएं, अब
लगता है कि शायद जिंदगी में
कुछ ऐसी ही यंत्र आ जाएं,
दुखी चेहरे को
फिर से मुस्कुराहट में बदल
जाएं,बस एक
प्यारी सी मुस्कान छोड़ देना
जिससे कि रिश्तो में कभी दरार
ना पढगी़े।
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