Saturday, September 14, 2019

कितना अच्छा होता

कितना अच्छा होता

बच्च्पन में जब बारिस के दिनो जब हम खेलने के लिए घरों से निकलते थे।
दूर बादलों पर सात रंगो से सजे इंद्रधनुष देखकर बड़े खुश हुआ करते और बारिस के बुंदों में भींगना, कागजों के नाव, तरह- तरह खेल, मस्ती किया करते दोस्तों के साथ।
बहुत खुश थे हम, हमारा सारा बच्चपन कितने हंसीन लम्हो के साथ गुजरता गया,
काश हमें बड़े होने के सपने ही नहीं देखना चाहिए था, कितना अच्छा होता।
हमें पता भी नहीं चला कि कब बड़े हो गए और अपनी खुशी वो पल अपनी मर्जी से जीना, दोस्तो के साथ बैठ ठहाके लगाना, अपनी अपनी व्यस्तता के साथ कागजों के टुकड़े कमाने में झोंक दिये।

चलों एक बार फिर बारिस में भींगना और दोस्तो के साथ बैठ ठहाके लगाते है और जीते है, कुछ दिनों के लिए इंलेक्ट्रानिक्स समानों को छोड़ मोबाइल से दूरी बनाते है। क्योंकि आज कल लोगो के पास ससमय नहीं होता। कुछ लोग अपनी घरों में परेशानियों से घिरे रहते है।

ये मोबाइल और टेक्नॉलाजी ही है जो मनुष्य के आंख, कॉन, दिल की और अनके बीमारियों को जन्म देती है।
तो जरा संभलकर दोस्तो--------------

हमारा दायित्व बनता है, अपने आने वाली पीढ़ी को कुछ यादे सौंपकर हम अपने कुछ अनसुनी कहानी से अवगत कराते है। कुछ पल अपने फैमिली और सगे संबंधियों के साथ बैठ जीवन के हंसीन लम्हों के बारे में चर्चा कर अपने जीवन को सुखमय बनाते है।
अगर मेरी छोटी सी कहानी अच्छे लगी हो तो एक बार अपने प्रियजनों से मिलकर हंसी के ठहाके जरूर लगाएं।

लेख-
योगेश साहू (@iamyskartist)